मंगलवार, 23 नवंबर 2010

संवेदनाएं

बिना दरवाजे, खिड़कियों की झोपड़ी में,
बाहों में बाहें डाले,
मिला करती थी, तेरी-मेरी संवेदनाएं।
सिसक, सिमटकर कह जाती,
एक-दूसरे का दर्द।
खिलखिलाकर बांटती थी,
खुषी के लम्हे, बीते वाकये।
अब नहीं मिल पाती संवेदनाएं,
पहले जैसी निकटता अब कहाँ,
छत के नीचे की दीवारों पर
जड़ गए हैं दरवाजे।
बंद रहती है खिड़की हमेषा,
खुलती भी है तो मोटा पर्दा
बीच में आ जाता है, दूरियाँ बढ़ाने।
कैसे मिलें, कैसे कहें?
अब अपना सुख-दुख कैसे बांटें?
घुट रही है जिन्दगी,
अकेली, निराधार, असहाय!
काश! यह पर्दा उठे,
दिखजाए संवेदना का चेहरा फिर,
दूर करे कोई उसकी उदासी,
पूछ जाए आकर, सीने से लगाकर,
क्या तुम्हें कुछ कहना है? मुझसे . . . . . .

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें