श्री कैलाश चन्द्र पंत- 26 अप्रैल 1936 को मध्यप्रदेश के महू में जन्में श्री कैलाश चन्द्र पंत बड़े ही सरल व प्रभावी व्यक्तित्व के धनी हैं। कॉलेज की साहित्य समिति के अध्यक्ष श्री कैलाश चन्द्र पंत ने अनेक साहित्यिक आयोजनों के माध्यम से उन्होंने छात्रों में साहित्य के प्रति जागरूकता पैदा की। कैलाश जी ने अँगरेज़ी के बाद हिन्दी में भी एमए किया। कैलाश जी के पिता शिक्षकक थे। सात भाई और दो बहने। कैलाश जी की पत्नी ने एक वर्ष तक शिक्षिका के रूप में कार्य किया । अब वे एक सफल गृहिणी हैं। कैलाश जी के परिवार में उनकी तीन विवाहित पुत्रियाँ हैं। उनकी अब तक प्रकाशित कृतियाँ हैं- धुन्ध के आर-पार निबन्ध संग्रह, शब्द का विचार पक्ष, कौन किसका आदमी व्यंग्य संग्रह । इसके साथ ही सृजन यात्रा शैलेष मटियानी का सम्पादन किया तथा विभिन्न विषयों पर उनके लगभग 800 आलेख प्रकाशित हो चुके हैं। आप राष्ट्रभाषा प्रचार समिति मध्यप्रदेश के अध्यक्ष भी रह चुके हैं । प्रस्तुत है विशेष तौर पर सृजनगाथा के लिए जया केतकी द्वारा उनसे लिया गया साक्षत्कार- संपादक
कैलाश जी आपकी साहित्यिक रुचि कब जागृत हुई?
इन्दौर में क्रिश्चियन कॉलेज में अध्ययन के दौरान मैंने साहित्य में रूचि लेना आरंभ किया।
किस विधा में आप विशेष रूप से रचना करते हैं?
मैंने ललित निबन्ध से लिखना आरम्भ किया। फिर समीक्षा और व्यंग्य। समीक्षाएँ करता हूँ।
आप हिन्दी के अलावा अन्य किसी भाषा में लिखते हैं?
नहीं, प्रमुख रूप से हिन्दी की ही सेवा कर रहा हूँ।
विभिन्न माध्यमों में हिन्दी के प्रयोग पर प्रकाश डालें?
अधकचरा भाषा का प्रयोग बढ़ रहा है। भाषा की शुद्धता को प्राथमिकता दी जाना चाहिए। अँगरेज़ी का विरोधी नहीं हूँ मैं। पर खिचड़ी भाषा से बेहतर मैं किसी एक भाषा को मानता हूँ।
आजकल जो लिखा जा रहा है, उससे आप कितने संतुष्ट हैं?
कैलाश चंद्र पंत मेरी संतुष्टि की बात ही नहीं है। संतुष्ट तो पाठक को करना होगा। जो भी लिखा जाए यह ध्यान में रखकर लिखा जाए कि पाठक क्या पढ़ना चाहता है।
वर्तमान पीढ़ी में आप किसे अच्छा लेखक मानते हैं? कोई विशेष नाम?
वर्तमान लेखन में कार्पारेट जगत का प्रभाव स्पष्ट देखा जा सकता है। लेखन में भी भारतीय दृष्टिकोण पश्चिमी से भिन्न है। पश्चिम में भौतिक प्रगति पहले दर्ज़े पर है पर भारत में दूसरे दर्ज़े पर । हमारे यहाँ व्यक्ति पहले दर्ज़े पर है। पश्चिमी और पूर्वात्य का समन्वय कर लिखने वालों में एम. जे. अकबर और चन्दन मित्रा हैं। भारतीय परिस्थितियाँ बिल्कुल भिन्न हैं। भौगोलिक भिन्नता भी है। आबादी, पानी जैसी समस्या उनके यहाँ नहीं हैं।
क्या आप मानते हैं कि साहित्यिक आयोजनों से साहित्य को कोई लाभ हो रहा है या इनका कोई औचित्य है?
साहित्यिक आयोजनों का सबसे बड़ा योगदान यह है कि ये रचनाकारों को एक मंच प्रदान करते हैं। रचनात्मकता बढ़ाते हैं। आलोचना, प्रत्यालोचना द्वारा गंभीरता, प्रगाढ़ता और सुधार को बढ़ावा देते हैं।
आज की हिन्दी की जो आलोचना चारों ओर हो रही है, इस संबंध आप कुछ कहना चाहेंगे?
भाषा तो कोई भी बुरी नहीं होती, वह तो अभिव्यक्ति का माध्यम है। हिन्दी बोलें तो हिन्दी और अँगरेज़ी में लिखें तो अँगरेज़ी। अधकचरा भाषा से बचें।
आपको ऐसा नहीं लगता कि साहित्यिक विचार गोष्ठियाँ, साहित्यिक विवाद गोष्ठियों में बदलती जा रही हैं?
कभी-कभी पर वैचारिक आदान-प्रदान के बिना साहित्य में दृढ़ता नहीं आती। प्रष्न निकलते हैं तो सवाल-जवाब होते ही हैं।
आधुनिकता की आढ़ में साहित्य के साथ जो खिलवाड़ हो रहा है, इसे आप क्या मानते हैं?
आधुनिकता नहीं समय का प्रवाह है यह। आरम्भ में विषय सीमित थे। अब नए-नए विषयों पर लिखा जा रहा है- दलित चेतना, महिला चेतना, विकलांग विमर्श आदि। अंधानुकरण किसी भी चीज़ का ठीक नहीं। अति सर्वत्र वर्जते!
हिन्दी साहित्य के पाठकों के बारे में कुछ कहें?
अधिक लिखा जा रहा है कि पाठक भ्रमित है कि क्या पढ़े।
समाज की स्थिति को लेकर जो चिंता व्यक्त की जा रही है, इस संबंध में क्या कहना चाहेंगे?
समाज पर कार्पोरेट जगत का प्रभाव है। पश्चिम का अंधानुकरण करने वाले कुछ लोग भारत को इन्डिया बनाना चाहते हैं। सभ्यता के छत्र को उल्टा घुमाया जा रहा है। इससे आर्थिक विषमता बढ़ रही है। जो हो चुका है उसे दोहरा रहे हैं। लिव इन रिलेशन इन्डिया में तो चलेगी पर भारत में नहीं।
आज लघु पत्रिकाओं की बाढ़ सी आ गई है, आपकी क्या राय है?
ये सच है कि जितनी तेज़ी से निकलती हैं उतने ही कम समय में बंद भी हो जाती हैं। अभिव्यक्ति के लिए मन तो सभी का मचलता है। लघु पत्रिकाओं में स्थानीय मुद्दों और स्थानीय लेखकों दोनों को महत्व मिलता है।
इन्टरनेट, उसकी आवश्यकता और महत्व पर कुछ प्रकाश डालें?
इन्टरनेट महत्वपूर्ण साधन है आज के समय में। लेखक भी इसका भरपूर फ़ायदा ले सकते हैं। शीघ्र संचार और साहित्य के संबंध में जानकारियाँ, रेडी रिफ्रेन्स, पुस्तकों की जानकारी, मँगाने की सुविधा है। परन्तु प्रश्नों के उत्तर तथा तर्क-वितर्क की क्षमता तो पुस्तकों में होती है। इन्टरनेट पर काम करते समय आलोचक मस्तिष्क काम नहीं करता। प्रश्नाकुलता के कारण ही साहित्य रचा जाता है। सत्य की खोज ही अंतिम है और भारतीय चिन्तन में सत्य की खोज जारी है।
क्या आधुनिकता हमारी परम्पराओं पर हॉवी हो रही है?
हॉवी तो नहीं हो रही परन्तु प्रभाव तो स्पष्ट दिखाई दे रहा है। पहले शादियाँ घरों, धर्मशालाओं में होती थी, अब लॉन और होटलों में शादियाँ होना स्टेटस सिम्बल बनता जा रहा है। हलवाई-प्रथा कम हो रही है। महँगे कार्डों को प्रधानता दी जाती है। इससे आर्थिक सुंतुलन बिगड़ रहा है।
साहित्य और तकनीक का साथ, इस संबंध में आप क्या कहना चाहेंगे?
साहित्य और तकनीक का साथ अच्छा है। तकनीक से कार्य शीघ्रता से सम्पन्न होते हैं।
आज की युवा पीढ़ी के लेखकों को कोई संदेश देना चाहेंगे?
सृजनशीलता बिना अध्ययन और चिन्तन के अपनी सार्थकता प्राप्त नहीं कर सकती। संवेदना केवल शब्दों में व्यक्त नहीं की जा सकती। नए लेखकों को अपनी संवेदना को संरक्षित रखना ही नहीं चाहिए उसके अनुरूप जीना भी चाहिए। उन्हें अध्ययन में ज़्यादा से ज़्यादा रुचि प्रदर्षित करना चाहिए।
कैलाश चन्द्र पंत
साहित्यकार निवास, हिन्दी भवनगांधी भवन के पास, पॉलिटेक्नीक चौराहाभोपाल, मध्यप्रदेशमो. 9826046792
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