मंगलवार, 23 नवंबर 2010

आइए बचपन सँवारें


छोटा सा नन्हा सा बचपन, मतलबी दुनिया की तिकड़म भरी बातों से बेखबर! फिर भी हम उसे सँवार नहीं पाते। बचपन एक ऐसी अवस्था है, जहाँ जाति-धर्म-क्षेत्र, अच्छाई और बुराई कोई मायने नहीं रखते। बच्चे राष्ट्र की आत्मा हैं और अतीत को सहेज कर रखने की जिम्मेदारी भी इन मासूम कंधों पर है। बच्चों में राष्ट्र का वर्तमान करवटें लेता है और भविष्य के अदृश्य बीज पल्लवित-पुष्पित होते हैं। दुर्भाग्यवश अपने देश में बच्चों के शोषण की घटनाएं प्रतिदिन की बात हो गई हैं। नंगी आंखों से देखते हुए भी झुठलाना रहे हैं-चाहे वह निठारी कांड हो, अध्यापकों द्वारा बच्चों को मारना-पीटना हो, बच्चियों का यौन शोषण हो या अनुसूचित जाति जनजाति के़े बच्चों का जातिगत शोषण।

राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय द्वारा आयोजित बाल चित्रकला प्रतियोगिता के दौरान बच्चों को पकड़ने वाले दैत्य, बच्चे खाने वाली चुड़ैल और बच्चे चुराने वाले लोगों को अपने पेंटिंग्स का आधार बनाया। यह दर्शाता है कि बच्चों के मस्तिष्क साथ हुये दुर्व्यवहार से ग्रस्त हैं। वे भय में डरावनी यादों के साथ जी रहे हैं।

बालश्रम की बात करें तो आँकड़ों के अनुसार भारत में पाँच करोड़ बाल श्रमिक हैं। अन्तरराष्ट्रीय श्रम संगठन ने भी भारत में सर्वाधिक बाल श्रमिक होने पर चिन्ता व्यक्त की है। कुछ बम आदि बनाने जैसे खतरनाक उद्योगों मे काम करते या किसी ढाबे में जूठे बर्तन धोतेे या धार्मिक स्थलों पर भीख माँगते नजर आते हैं अथवा कुछ लोगों के घरों में नौकर का जीवन जी रहे होते हैं।

सरकार ने सरकारी अधिकारियों कर्मचारियों द्वारा बच्चों को घरेलू बाल मजदूर के रूप में काम पर लगाने के विरुद्ध एक निषेधाज्ञा जारी की पर दुर्भाग्य से सरकारी अधिकारी, कर्मचारी, नेतागण बुद्धजीवी समाज के लोग ही इन कानूनों का मखौल उड़ा रहे हैं। पिछले दषक के मूल्यांकन में देश भर में करीब 26 लाख बच्चे घरों या अन्य व्यवसायिक केन्द्रों में नौकर की तरह काम करते पाए गए। अधिकतर स्वयंसेवी संस्थाएं या पुलिस खतरनाक उद्योगों में कार्य कर रहे बच्चों को मुक्त तो करा लेती हैं पर उसके बाद जिम्मेदारी से उन्हे स्थापित नहीं करतीं। ऐसे बच्चे किसी रोजगार या उचित पुनर्वास के अभाव में पुनः उसी दलदल में या अपराधियों की शरण में जाने को मजबूर हो जाते हैं।

बाल अधिकार आयोग के अनुसार बच्चों के अधिकारों को बढ़ावा देने तथा उनके हितों की पूर्ति का ध्यान रखना जरूरी है। किसी एक व्यक्ति द्वारा इस कर्तव्य का वहन नहीं किया जा सकता। निजी और सार्वजनिक पदाधिकारियों में बाल अधिकारों के प्रति अभिरुचि उत्पन्न करना भी उनका दायित्व है। कुछ देशों में तो लोकपाल सार्वजनिक विमर्शों में भाग लेकर जनता की अभिरुचि बाल अधिकारों के प्रति बढ़ाते हैं एवं जनता नीति निर्धारकों के रवैये को प्रभावित करते हैं। यही नहीं वे बच्चों और युवाओं के साथ निरन्तर सम्वाद कायम रखते हैं, ताकि उनके दृष्टिकोण और विचारों को समझा जा सके। बच्चों के प्रति बढ़ते दुर्व्यवहार एवं बालश्रम की समस्याओं के चलते भारत में भी बच्चों के लिए स्वतंत्र लोकपाल व्यवस्था गठित करने की माँग है।

आज जरूरत है कि बालश्रम और बाल उत्पीड़न की स्थिति से राष्ट्र को उबारा जाये। ये बच्चे भले ही आज वोट बैंक नहीं हैं पर आने वाले कल के नागरिक हैं। उन अभिभावकों को जो कि तात्कालिक लालच में आकर अपने बच्चों को बालश्रम में झोंक देते हैं, भी इस सम्बन्ध में समझदारी का निर्वाह करना पड़ेगा कि बच्चों को शिक्षा रूपी उनके मूलाधिकार से वंचित नहीं किया जा सकेे। गैर सरकारी संगठनों और सरकारी मात्र कागजी खानापूर्ति या मीडिया की निगाह में आने के लिये अपने दायित्वों का निर्वहन नहीं करना चाहिए। उनका उद्देश्य इनकी वास्तविक स्वतन्त्रता सुनिश्चित करना और उन्हें एक सफल नागरिक बनाना होना चाहिए।

क्या हम भी भाग ले सकते हैं इस धार्मिक कार्य में। हाँ आज के समय में यह एक अनुष्ठान से कम नहीं। शुरुआत अपने घर से ही करें। आपके घर में कामवाली बीमारी का बहाना कर बच्चों को काम पर भेजे तो आप उससे काम कराएं। एक दिन स्वयं काम करें।

उत्तिष्ठ गोविन्दम् उत्तिष्ठम् गरुड़ध्वजः देवोत्थानी एकादशी

उत्तिष्ठ गोविन्दम् उत्तिष्ठम् गरुड़ध्वजः
देवोत्थानी एकादशी


आषाढ़ शुक्ल से कार्तिक शुक्ल तक ठाकुर जी क्षीरसागर में शेषशैया पर शयन करते हैं। भक्त उनके शयन और प्रबोध के यथोचित कृत्य करते हैं। तुलसी का वृक्ष हिन्दू धर्म में पूजनीय है। यह धर्म और आस्था के साथ ही औषधि जगत में भी महत्व रखता है। हिन्दू धर्म के अनुसार प्रतिदिन प्रातः स्नान के बाद तुलसी में जल चढ़ाना षुभ माना जाता है। ठाकुर जी की पूजा बिना तुलसी दल के पूरी ही नहीं होती।
भगवान् क्षणभर भी सोते नहीं हैं, उपासकों को शास्त्रीय विधान अवश्य करना चाहिये। यह कृत्य कार्तिक शुक्ल एकादशी को रात्रि के समय किया जाता है। इस व्रत के दिन स्नानादि से निवृत्त होकर आँगन में चौक पूरकर विष्णु भगवान् के चरणों को अंकित करते हैं। रात्रि में विधिवत पूजन किया जाता है। आँगन या ओखली में एक बड़ा-सा चित्र बनाते हैं। इसके पश्चात् फल, सिंघाड़ा, गन्ना तथा पकवान आदि समर्पित करते हैं। एक अखण्ड दीपक रात भर जलता है। रात को व्रत की कथा सुनी जाती है। इसके बाद ही मांगलिक कार्य आरम्भ होते हैं। इस दिन उपवास करने का विशेष महत्त्व है। उपवास न कर सके तो एक समय फलाहार करना चाहिये और नियमपूर्वक रहना चाहिये। रात्रि-जागरण का भी विशेष महत्त्व है।
हरि को जगाने के लिये कीर्तन, वाद्य, नृत्य और पुराणों का पाठ करते हैं। धूप, दीप, नैवेद्य, फल और अर्ध्य से पूजा करके घंटा, शंख, मृदंग वाद्यों की मांगलिक ध्वनि द्वारा भगवान् को जागने की प्रार्थना करें।
प्रार्थना:-
उदितष्ठोतिष्ठ गोविन्द त्यज निद्रां जगत्पते,
त्वयि सुप्ते जगन्नाथ जगत्सुप्तं भवेदिदम।
उत्थिते चेष्टते सर्वमुत्तिष्ठोत्तिष्ठ माधव।।
दीपावली से ग्यारहवीं तिथि में देवत्व प्रबोधन एकादशी मनाई जाती है। मान्यता है कि देव प्रबोधन मंत्रों से दिव्य तत्वों की जागृति होती है।
मंत्र
ब्रह्मेन्द्ररुदाग्नि कुबेर सूर्यसोमादिभिर्वन्दित वंदनीय,
बुध्यस्य देवेश जगन्निवास मंत्र प्रभावेण सुखेन देव।
इसका अर्थ है- ब्रह्मा, इंद्र, रुद्र, अग्नि, कुबेर, सूर्य, सोम आदि से वंदनीय, हे जगन्निवास, देवताओं के स्वामी आप मंत्र के प्रभाव से सुखपूर्वक उठें।
यह एकादशी भगवान विष्णु की आराधना का अवसर है। ब्रह्ममुहूर्त में नगर में भगवान नाम कीर्तन गाजे-बाजे के साथ बालक, युवा, नर-नारि मिलकर नगर परिक्रमा करते हैं। आतिशबाजी के साथ देवोत्थान उत्सव मनाते हैं। गृहलक्ष्मी कलश के ऊपर दीप प्रज्वलित कर चलती हैं। पुराणों में इस तिथि में पूजन कार्य को फलदायी माना जाता है। इस दिन व्रत करने, भगवत भजन करने से अभीष्ट फल प्राप्त होता है । संध्या के समय गन्ने का मंडप बनाकर मध्य में चौकी पर भगवान विष्णु को प्रतिष्ठित करने एवं दीप प्रज्वलित करके अक्षत, पुष्प, नैवेद्य आदि के साथ पूजा श्रद्धापूर्वक करना चाहिए।
भारतीय संस्कृति के अनुसार हमारे देश में सदा दिव्य शक्ति को जाग्रत किया जाता है। संपूर्ण विश्व में शांति, समृद्धि, मानवीय मूल्य, धर्म, सत्य, न्याय, सत्कर्म, अच्छाई व सच का दीपक जलता रहे ऐसा विष्वास किया जाता है। विश्व में हिंसा, अनाचार, अराजकता, अव्यवस्था व अशांति का बोलबाला है। ऐसे समय में ईष्वर आराधना का महत्व बढ़ जाता है।

देवोत्थान एकादशी को डिठवन भी कहा जाता है। चार माह के शयनोपरांत भगवान विष्णु क्षीरसागर में जागते हैं। हरि-जागरण के उपरांत ही शुभ-मांगलिक कार्य प्रारंभ होते हैं। क्योंकि शयनकाल में मांगलिक कार्य नहीं किए जाते। कार्तिक शुक्ल पक्ष की देवउठनी एकादशी और तुलसी विवाह के साथ ही परिणय-मंगल आदि के सभी मांगलिक कार्य पुनः प्रारंभ होते हैं। देवोत्थान एकादशी को दीपपर्व का समापन दिवस भी माना जाता है। इसीलिए इस दिन लक्ष्मी का पुण्य स्मरण करना चाहिए।
देवउठनी एकादशी के बाद गूँजेगी शहनाई
वर्ष 2010 में विवाह करने के इच्छुक जोड़ों की राह फिर साफ हो गई हैं। कुछ शुभ मुहूर्त छोड़कर नवंबर व दिसंबर में विवाह होने से विवाह समारोहों की भरमार होगी। 18नवंबर 2010 से अनेक जोड़े वैवाहिक बंधन में बंध सकेंगे। नवंबर से जनवरी तक वैवाहिक मौसम माना जाता है।
एक ही तारीखों पर काफी विवाह मुहूर्त होने से एक ही दिन में बैंड व घोड़े वालों को काफी बारातों के ऑर्डर होंगे। उन्हें जल्दी एक बारात निपटाकर दूसरी पार्टी की बारात में जाना होगा। विवाह कार्यक्रम के लिए शादीहाल, गार्डन व धर्मशालाएँ महीनों पहले बुक होती हैं। फरवरी के मुहूर्त तक अभी से बुकिंग आरंभ कर दी गई है।
देवउठनी एकादशी सामाजिक चैतन्यता की प्रतीक मानी जाती है। तुलसी के पौधे ने घर के आँगन को तपोभूमि सा स्वरूप दिया है। आध्यात्मिक पर्यावरण को मनोरम बनाने में तुलसी की निर्णायक उपस्थिति रही है। कार्तिक मास तुलसी पूजन के लिए विशेष रूप से पवित्र माना गया है। नियमित रूप से स्नान के पश्चात् ताम्रपात्र से तुलसी को प्रातःकाल जल दिया जाता है। संध्याकाल में तुलसी के चरणों में घी का दीपक जलाते हैं। कार्तिक पूर्णिमा को इस मासिक दीपदान की पूर्णाहुति होती है।
कार्तिक मास की अमावस्या को तुलसी की जन्मतिथि मानी गई है, इसलिए संपूर्ण कार्तिक मास तुलसीमय होता है। कोई कार्तिक मास की एकादशी को तुलसी विवाह रचाते हैं। इस दिन तुलसी विवाह करना ज्यादा श्रेयस्कर माना जाता है। तुलसी विवाह की चिरायु परंपरा अनुपमदृश्य उपस्थित करती है। सामाजिक तौर पर देवउठनी ग्यारस या एकादशी से ही परिणय-मंगल व अन्य मांगलिक कार्य शुरू किए जाते हैं, इसलिए वैज्ञानिक विवेचन के अनुसार देवउठनी ग्यारस ही तुलसी विवाह की तर्कसंगत तिथि है।

तुलसी के संबंध में अनेक पौराणिक गाथाएँ विद्यमान हैं। विशिष्ट स्त्री जो अनुपम सौंदर्य की स्वामिनी हो, उसे तुलसी कहा जाता है। तुलसी के अन्य नामों में वृन्दा और विष्णुप्रिया खास माने जाते हैं। पौराणिक कथा के अनुसार जालंधर असुर की पत्नी का नाम वृन्दा था, जो बाद में लक्ष्मी के श्राप से तुलसी में परिवर्तित हो गई थी। मान्यता है कि राक्षसों के गुरु, शुक्र ने जालंधर दानव को संजीवनी विद्या में पारंगत किया था। जालंधर की पत्नी वृन्दा पतिव्रता नारी थी और पत्नी की इस पतिव्रता शक्ति के कारण वह अमरत्व के नशे में चूर होकर देवताओं को सताता था। नारद मुनि ने जालंधर के समक्ष पार्वती के सौंदर्य का वर्णन कर दिया, जिसे सुनकर दानव मुग्ध हो गया। फिर पार्वतीजी को पाने की इच्छा से जालंधर ने छद्म रूप से शिव का रूप धारण किया और कैलाश पर्वत जा पहुँचा। पार्वतीजी ने सहायता के लिए भगवान विष्णु का स्मरण किया। तब अपनी माया से भगवान विष्णु ने वृन्दा का सतीत्व भंग किया और जालंधर का वध किया।
वृन्दा के नाम पर ही श्रीकृष्ण की लीलाभूमि का नाम वृन्दावन पड़ा। ऐसा भी विश्वास किया जाता है कि आदिकाल में वृन्दावन में वृन्दा यानी तुलसी के वन थे।

तुलसी प्रत्येक आँगन में होती है और इसकी उपस्थिति से हर आँगन वृन्दावन हो उठता है। तुलसी के वृक्ष को अर्ध्य धूप, दीप, नैवेद्य आदि से प्रतिष्ठित किया जाता है। आयुर्वेदिक संहिताओं में उल्लेखित तुलसी की औषधि-क्षमताओं से धरती अभिभूत है। तुलसी पर्यावरण को स्वास्थ्यवर्धक बनाती है।

संवेदनाएं

बिना दरवाजे, खिड़कियों की झोपड़ी में,
बाहों में बाहें डाले,
मिला करती थी, तेरी-मेरी संवेदनाएं।
सिसक, सिमटकर कह जाती,
एक-दूसरे का दर्द।
खिलखिलाकर बांटती थी,
खुषी के लम्हे, बीते वाकये।
अब नहीं मिल पाती संवेदनाएं,
पहले जैसी निकटता अब कहाँ,
छत के नीचे की दीवारों पर
जड़ गए हैं दरवाजे।
बंद रहती है खिड़की हमेषा,
खुलती भी है तो मोटा पर्दा
बीच में आ जाता है, दूरियाँ बढ़ाने।
कैसे मिलें, कैसे कहें?
अब अपना सुख-दुख कैसे बांटें?
घुट रही है जिन्दगी,
अकेली, निराधार, असहाय!
काश! यह पर्दा उठे,
दिखजाए संवेदना का चेहरा फिर,
दूर करे कोई उसकी उदासी,
पूछ जाए आकर, सीने से लगाकर,
क्या तुम्हें कुछ कहना है? मुझसे . . . . . .