बुधवार, 19 जनवरी 2011

आइए बचपन सँवारें



छोटा सा नन्हा सा बचपन मतलबी दुनिया की तिकड़म भरी बातों सेबेखबर! फिर भी हम उसे सँवार नहीं पाते। बचपन एक ऐसी अवस्था है, जहाँजाति-धर्म-क्षेत्र, अच्छाई और बुराई कोई मायने नहीं रखते। बच्चे राष्ट्र की आत्मा हैंऔर अतीत को सहेज कर रखने की जिम्मेदारी भी इन मासूम कंधों पर है। बच्चोंमें राष्ट्र का वर्तमान करवटें लेता है और भविष्य के अदृश्य बीज पल्लवित-पुष्पितहोते हैं। दुर्भाग्यवश अपने देश में बच्चों के शोषण की घटनाएं प्रतिदिन की बात होगई हैं। नंगी आंखों से देखते हुए भी झुठलाना रहे हैं-चाहे वह निठारी कांड हो,अध्यापकों द्वारा बच्चों को मारना-पीटना हो, बच्चियों का यौन शोषण हो याअनुसूचित जाति जनजाति के़े बच्चों का जातिगत शोषण।

राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय द्वारा आयोजित बाल चित्रकला प्रतियोगिता केदौरान बच्चों को पकड़ने वाले दैत्य, बच्चे खाने वाली चुड़ैल और बच्चे चुराने वालेलोगों को अपने पेंटिंग्स का आधार बनाया। यह दर्शाता है कि बच्चों के मस्तिष्कसाथ हुये दुर्व्यवहार से ग्रस्त हैं। वे भय में डरावनी यादों के साथ जी रहे हैं।

बालश्रम की बात करें तो आँकड़ों के अनुसार भारत में पाँच करोड़ बालश्रमिक हैं। अन्तरराष्ट्रीय श्रम संगठन ने भी भारत में सर्वाधिक बाल श्रमिक होनेपर चिन्ता व्यक्त की है। कुछ बम आदि बनाने जैसे खतरनाक उद्योगों मे कामकरते या किसी ढाबे में जूठे बर्तन धोतेे या धार्मिक स्थलों पर भीख माँगते नजरआते हैं अथवा कुछ लोगों के घरों में नौकर का जीवन जी रहे होते हैं।

सरकार ने सरकारी अधिकारियों कर्मचारियों द्वारा बच्चों को घरेलू बालमजदूर के रूप में काम पर लगाने के विरुद्ध एक निषेधाज्ञा जारी की पर दुर्भाग्य सेसरकारी अधिकारी, कर्मचारी, नेतागण बुद्धजीवी समाज के लोग ही इन कानूनोंका मखौल उड़ा रहे हैं। पिछले दषक के मूल्यांकन में देश भर में करीब 26 लाखबच्चे घरों या अन्य व्यवसायिक केन्द्रों में नौकर की तरह काम करते पाए गए।अधिकतर स्वयंसेवी संस्थाएं या पुलिस खतरनाक उद्योगों में कार्य कर रहे बच्चोंको मुक्त तो करा लेती हैं पर उसके बाद जिम्मेदारी से उन्हे स्थापित नहीं करतीं।ऐसे बच्चे किसी रोजगार या उचित पुनर्वास के अभाव में पुनः उसी दलदल में याअपराधियों की शरण में जाने को मजबूर हो जाते हैं।

बाल अधिकार आयोग के अनुसार बच्चों के अधिकारों को बढ़ावा देने तथाउनके हितों की पूर्ति का ध्यान रखना जरूरी है। किसी एक व्यक्ति द्वारा इस कर्तव्यका वहन नहीं किया जा सकता। निजी और सार्वजनिक पदाधिकारियों में बालअधिकारों के प्रति अभिरुचि उत्पन्न करना भी उनका दायित्व है। कुछ देशों में तोलोकपाल सार्वजनिक विमर्शों में भाग लेकर जनता की अभिरुचि बाल अधिकारों केप्रति बढ़ाते हैं एवं जनता नीति निर्धारकों के रवैये को प्रभावित करते हैं। यहीनहीं वे बच्चों और युवाओं के साथ निरन्तर सम्वाद कायम रखते हैं, ताकि उनकेदृष्टिकोण और विचारों को समझा जा सके। बच्चों के प्रति बढ़ते दुर्व्यवहार एवंबालश्रम की समस्याओं के चलते भारत में भी बच्चों के लिए स्वतंत्र लोकपालव्यवस्था गठित करने की माँग है।

आज जरूरत है कि बालश्रम और बाल उत्पीड़न की स्थिति से राष्ट्र कोउबारा जाये। ये बच्चे भले ही आज वोट बैंक नहीं हैं पर आने वाले कल केनागरिक हैं। उन अभिभावकों को जो कि तात्कालिक लालच में आकर अपने बच्चोंको बालश्रम में झोंक देते हैं, भी इस सम्बन्ध में समझदारी का निर्वाह करनापड़ेगा कि बच्चों को शिक्षा रूपी उनके मूलाधिकार से वंचित नहीं किया जा सकेे।गैर सरकारी संगठनों और सरकारी मात्र कागजी खानापूर्ति या मीडिया की निगाहमें आने के लिये अपने दायित्वों का निर्वहन नहीं करना चाहिए। उनका उद्देश्यइनकी वास्तविक स्वतन्त्रता सुनिश्चित करना और उन्हें एक सफल नागरिकबनाना होना चाहिए।

क्या हम भी भाग ले सकते हैं इस धार्मिक कार्य में। हाँ आज के समयमें यह एक अनुष्ठान से कम नहीं। शुरुआत अपने घर से ही करें। आपके घर मेंकामवाली बीमारी का बहाना कर बच्चों को काम पर भेजे तो आप उससे काम कराएं। एक दिन स्वयं काम

सोमवार, 13 दिसंबर 2010

भुला ना पाएंगे तुमको



अभिनेत्र्ाी स्मिता पाटिल की पुण्यतिथि

-जया केतकी

भारतीय फिल्मों को विष्व में एक उच्च स्थान प्राप्त है। बॉलीवुड की फिल्में और अभिनेता पूरे फिल्म जगत में छाए हैं। फिल्मों की चर्चा हो और बॉलीवुड की अभिनेत्रियों का जिक्र आए ऐसा हो नहीं सकता। ऐसा ही एक चिर-परिचित नाम है-स्मिता पाटिल का। 70 और 80 के दषक में अपनी अभिनय कला से धूम मचाने वाली इस अदाकारा को आज भी फिल्म जगत उसी आदर से याद करता है। कला और कलाकार का मनोरंजन की दुनिया में ऐसा स्थान है जो कलम और काग़ज का लेखन में हैं। जब मन बहुत उदास, खिन्न या थका हो उसे अदाकारी का जलवा देखने मिले तो थकान का एहसास नहीं होता। 1960 के दशक से आज तक फिल्मी दुनिया का असर हर उम्र हर क्षेत्र्ा पर देखा जा रहा है।

मनोरंजन के अनेक साधन उपलब्ध हैं, फिर भी फिल्मी हस्तियों और फिल्मों के प्रभाव और आकर्षण से बचना मुश्किल हैं थकान और व्यवस्तता के बावजूद हम फिल्मों का मोह नहीं छोड़ सकते। फिल्में हमारा मनोरंजन भी करती हैं और मुष्किल आने पर मार्गदर्षन भी करती हैं।

भारतीय सिनेमा बंगाल, मुद्रास, पंजाब के साथ ही महाराष्ट्र का भी ऋणी है। सिने सुंदरियांॅ मद्रास, बंगाल और महाराष्ट्र से सबसे ज्यादा आई हैं। जिनका जादू आज भी बढ़-चढ़ कर बोल रहा है। महाराष्ट्र की अभिनेत्र्ाियों में संध्या, दुर्गा खोटे, लीना चंद्रावकर, ललिता पवार, नंदा, राजश्री, ममता कुलकर्णी रीमा लागू, स्मिता पाटिल काफी चर्चित रही। आज भी उनकी अभिनीत फिल्में अधिक से अधिक दर्षकों द्वारा देखी जाती हैं।

महाराष्ट्र की सिने अभिनेत्र्ाियों में स्मिता पाटिल खूबसूरत स्मार्ट, वाकपटु एवं अभिनय में परिपक्व थीं। वे 17 अक्टूबर 1955 को एक राजनीति से जुड़े परिवार में जन्मीं। बचपन से उनका लगाव कला और अभिनय की तरफ रहा। उन्होंने न्यूज रीडर तथा फोटोग्राफर के रूप में अपना व्यावसायिक जीवन आरंभ किया।

स्मिता पाटिल सुहासिनी मुले तथा शबाना आजमी से प्रभावित रहीं। वह भारतीय महिलाओं की वास्तविक परेशानियों को उजागर कर उन्हें दूर करना चाहती थीं। ग्रामीण महिलाओं से उन्हें विशेष सहानुभूति थी। उन्होंने फिल्म एवं दूरदर्शन विभाग पूना से स्नातक किया। वे भारतीय कला फिल्मों तथा स्टेज से जुड़ी रहीं।

बॉलीवुड की सफल अदाकारा स्मिता के पिता मंत्र्ाी एवं माता समाज सेविका थीं। पूना, महाराष्ट्र में जन्मी स्मिता ने प्रारंभिक पढ़ाई मराठी भाषा में की। व्यवसाय में उनकी सफजता का एक कारण मीठी आवाज रही।उनकी आंखें बहुत सुंदर थी तथा साड़ी में उनकी खूबसूरती और भी बढ़ जाती थीं। वे महिलाओं को सशक्त बनाना चाहती थी। उन्होंने फिल्मों में भी इसी प्रकार की भूमिका का चयन किया।

फिल्म निर्माता श्याम बेनेगल ने उन्हें दूरदर्शन पर समाचार वाचक के रूप में देखा और अपनी फिल्म के लिए उनका चयन कर लिया। हिंदी यथार्थवादी सिनेमा में एक नया नाम स्मिता पाटिल के रूप में जुड़ा। स्मिता ने गोविन्द निहलानी, मृणालसेन की फिल्मों में भी अभिनय किया। शीघ्र ही उनके अभिनय कला की प्रशंसा होने लगी।भूमिकामें अभिनय के लिए उन्हें राष्ट्रीय पुरस्कार से नवाजा गया। एक के बाद एक उन्होंने अर्थ, मंथन, मंडी, बाजार जैसी सफल फिल्में की। आरंभिक दौर में वे कला फिल्मों से जुड़ी रहीं। धीरे-धीरे उन्होंने रोमेन्टिक रोल भी करना आरंभ किया। उनकी अभिनय प्रतिभा की गहराई को समझे के लिए उनकी तीन फिल्में ही काफी है- बाजार, भूमिका और सुबह। नई धारा की सिनेमा की दुनिया में शबाना आजमी के साथ स्मिता पाटिल की प्रतिद्वंदिता थी 80 के दषक की नमक-हलाल, शक्ति, मिर्च-मसाला, आखिर क्यों में उनके रोमांटिक रोल भी सराहे गए। हिंदी फिल्मों के अलावा स्मिता पाटिल ने मराठी, गुजराती, तेलगू, बंगला, कन्नड़ और मलयालम फिल्मों में भी अपनी कला का जौहर दिखाया। स्मिता पाटिल को महान फिल्मकार सत्यजीत रे के साथ काम करने का मौका मिला। मुंशी प्रेमचंद की बहुचर्चित कहानी पर बनी टेलीफिल्म सद्गति आज भी याद की जाती है। लगभग दो दशक तक अपने सशक्त अभिनय से दर्शकों के बीच अमिट पहचान पाई। स्मिता पाटिल ने व्यावसायिक सिनेमा के साथ-साथ समानांतर सिनेमा में भी सामंजस्य बनाए रखा।

मराठी फिल्मउम्बरठाउनकी बहुचर्चित फिल्म रही। फिल्मचक्रके लिये उन्हें 1981 में अभिनय को पुरस्कार दिया गया। फिल्म चक्र में सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्र्ाी का राष्ट्रीय एवं फिल्म फेयर अवार्ड मिला। इससे पूर्व भूमिका में भी उन्हें बेस्ट एक्ट्रेस के राष्ट्रीय पुरस्कार से नवाजा गया।

वे एक सफल फोटोग्राफर थीं। उनके द्वारा लिए गए चित्र्ाों की एक प्रदर्शनी उनकी मृत्यु के बाद लगाई गई। फिल्म अभिनेता राजबब्बर के साथ उन्होंने अपना वैवाहिक जीवन शुरू किया। उनके इस निर्णय को समाज में नकारा गया क्योंकि राजबब्बर पहले ही विवाहित थे। स्मिता पाटिल को एक बेटी भी हुई, पर उसे ठीक से दुलारना स्मिता पाटिल के भाग्य में नहीं था। पद्मश्री से सम्मानित स्मिता पाटिल एशिया की एकमात्र ऐसी अभिनेत्री थीं, जिनकी फिल्मों का पेरिस और लारोशेल में पुर्वालोकन किया गया। इस दौरान उन्हें सम्मानित भी किया गया था। उनका जीवन उनके पुत्र्ा प्रतीक के जनम के साथ ही 13 दिसंबर 1986 को समाप्त हो गया। प्रसव की कठिनाइयोंे के दौरान उनकी मृत्यु हो गई। उनके द्वारा खाली किए गए स्थान की भरपाई करना साधारण बात नहीं। सिनेमा के दर्शकों को स्मिता पाटिल जैसी दूसरी अभिनेत्री देखने को कम ही मिलेगी। जब भी नई धारा की फिल्मों की बात होगी, स्मिता पाटिल का नाम सम्मान के साथ लिया जाएगा।